जिद्दू कृष्णमूर्ति के अनुसार समाज कोई अलग संस्था नहीं, बल्कि हम व्यक्तियों के आपसी संबंधों का ही विस्तार है。 उनका मानना था कि जब तक व्यक्ति अपने भीतर के लोभ, भय और अहंकार से मुक्त नहीं होता, तब तक बाहर से किसी भी तरह का सामाजिक या राजनीतिक सुधार संभव नहीं है。
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