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सोमवार, 3 अगस्त 2026

आध्यात्मिकता - जिद्दू कृष्णमूर्ति

 




आध्यात्मिकता

जिद्दू कृष्णमूर्ति के अनुसार सच्ची आध्यात्मिकता किसी धर्म, गुरु, कर्मकांड या परंपरा का अंधा अनुसरण नहीं है, बल्कि यह स्वयं के मन और चेतना की गहरी समझ है। 

आध्यात्मिकता के मुख्य विचार 

 सत्य और विश्वास: कृष्ण-मूर्ति कहते थे कि किसी भी बात पर आंख मूंदकर विश्वास करना सत्य को पाना नहीं है, बल्कि विश्वास हमेशा सच को खोजने में रुकावट बनता है। 

 मन की समझ: बाहरी ईश्वर या स्वर्ग की कल्पना करने से पहले हमें अपने खुद के उलझे हुए और बेचैन मन की गतिविधियों को समझना होगा। 

 स्वतंत्रता: उनके अनुसार स्वतंत्रता किसी नियम का पालन करने से नहीं मिलती, बल्कि वह तभी संभव है जब मनुष्य अपने सारे भय, पूर्वाग्रहों और पुरानी यादों से पूरी तरह मुक्त हो जाए। 

गुरुओं का नकार: वे किसी भी प्रकार के पारंपरिक गुरु, धार्मिक संगठन या मध्यस्थ को भगवान या मोक्ष प्राप्ति का जरिया नहीं मानते थे। उनका मानना था कि व्यक्ति को अपना प्रकाश खुद बनना चाहिए। 

शनिवार, 25 जुलाई 2026

मन के खालीपन - जिड्डू कृष्णमूर्ति




 मन के खालीपन

जिड्डू कृष्णमूर्ति के अनुसार मन का खालीपन या मौन वह अवस्था है जहां विचारों का शोर शांत होता है, और इसी रिक्तता में जीवन की वास्तविक समझ और समस्याओं का समाधान संभव होता है। 

मन के खालीपन का अर्थ 

 जब मन अतीत की स्मृतियों, भय और पूर्वाग्रहों से मुक्त होता है, तब वह खाली होता है। 

 मन भविष्य की चिंता या कल्पना में नहीं भटकता, बल्कि पूरी तरह वर्तमान में रहता है। 

 'मैं' और मेरेपन (अहंकार) का जाल जब कमजोर पड़ता है, तब रिक्तता आती है। 

खाली मन का महत्व 

 पुराने विचारों के हटने से जो खालीपन बनता है, उसी मौन में कुछ नया और सहज घटित होता है। 

 जब भारी सोच से थककर मन शांत हो जाता है, तब उसी खालीपन में समाधान स्वतः मिल जाता है। 

 विचारों को जबरदस्ती रोकने से संघर्ष पैदा होता है; केवल बिना किसी निर्णय के मन की गतिविधियों को देखना ही ध्यान और शून्यता है। 



मंगलवार, 14 जुलाई 2026

दुख - जिद्दू कृष्णमूर्ति

 




जिद्दू कृष्णमूर्ति दुख को एक दुखद दुर्घटना के रूप में नहीं, बल्कि विचार, स्मृति और समय से जुड़ी एक स्व-निर्मित अवस्था के रूप में देखा।
उन्होंने सिखाया कि सच्चा दुख तभी समाप्त होता है जब हम उससे भागना बंद कर देते हैं और बिना किसी पूर्वाग्रह के उसका पूर्ण अवलोकन करते हैं, जिससे अंततः हमें गहन जुनून और ज्ञान प्राप्त होता है। 
 कृष्णमूर्ति ने कहा था कि "दुख विचार है, जो या तो अतीत की ओर जाता है या भविष्य की ओर।" जब हम शोक करते हैं, तो हम अतीत की यादों में खोए रहते हैं या किसी ऐसे व्यक्ति या वस्तु के बिना भविष्य की कल्पना करते हैं जिससे हम जुड़े होते हैं।
जब दुख आता है, तो मनुष्य तुरंत सांत्वना, मनोरंजन या दर्द को कम करने के लिए मनोवैज्ञानिक सहारे की तलाश करता है। कृष्णमूर्ति ने चेतावनी दी थी कि ये पलायन केवल अहंकार ("मैं") को मजबूत करते हैं और हमें अपने दुख की वास्तविकता से और भी दूर कर देते हैं। 
उन्होंने सुझाव दिया कि दर्द से भागने के बजाय, व्यक्ति को पूरी तरह निष्क्रिय भाव से उस भावना का प्रत्यक्ष अवलोकन करना चाहिए। यदि आप दर्द की तीव्रता को बिना उसे बदलने की इच्छा किए देख सकते हैं, तो अंततः दर्द अपने आप समाप्त हो जाता है। 
रोचक बात यह है कि कृष्णमूर्ति अक्सर इस बात पर जोर देते थे कि "जुनून" शब्द की जड़ दुख से जुड़ी है। मानवता के दुखों का गहराई से सामना करके और उन्हें अपने भीतर समाहित करके, व्यक्ति एक ऐसे अवैयक्तिक जुनून को खोजता है जो सच्ची रचनात्मकता के लिए आवश्यक है। 

गुरुवार, 25 जून 2026

एकांत (Solitude) क्या है? - कृष्णमूर्ति

 




एकांत (Solitude) क्या है?

कृष्णमूर्ति कहते हैं कि एकांत का मतलब जंगल जाना या घर छोड़ना नहीं है। असली एकांत वह है जब आपका मन बाहरी शोर और विचारों से पूरी तरह शांत हो。 

अकेलापन (Loneliness) और एकांत में अंतर: 


• अकेलापन (Loneliness): यह एक अधूरापन है। इसमें हम दुखी होते हैं। हम डरते हैं और किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु का सहारा खोजते हैं。 

• एकांत (Solitude): यह एक सुंदर अवस्था है। आप खुद के साथ खुश रहते हैं। आप किसी पर निर्भर नहीं होते。 


स्वयं को समझना:जब आप खुद के डर, लालच और विचारों को बिना किसी निर्णय के देखते हैं, तब आप खुद को जान जाते हैं。 यही समझ आपको एकांत और शांति देती है。 

Krishnamurti की किताबें और शिक्षाओं के बारे में अधिक जानने के लिए, आप Krishnamurti Foundation India पर जा सकते हैं。  



मंगलवार, 19 मई 2026

समाज - जिद्दू कृष्णमूर्ति

 



जिद्दू कृष्णमूर्ति के अनुसार समाज कोई अलग संस्था नहीं, बल्कि हम व्यक्तियों के आपसी संबंधों का ही विस्तार है。 उनका मानना था कि जब तक व्यक्ति अपने भीतर के लोभ, भय और अहंकार से मुक्त नहीं होता, तब तक बाहर से किसी भी तरह का सामाजिक या राजनीतिक सुधार संभव नहीं है。 


गुरुवार, 26 मार्च 2026

नींद और सपने - ओशो

 






नींद और सपनों पर ओशो  के विचार (हिंदी में): 


• सपनों का मतलब (Dreams): ओशो कहते हैं कि जब आप सोते हैं, तो मन सक्रिय रहता है, जिसे हम सपना कहते हैं। सपने आपके अधूरे दिनभर के विचारों, इच्छाओं और तनावों का प्रक्षेपण हैं। 

• नींद का रहस्य (Sleep): अगर आप 8 घंटे सोते हैं, तो 6 घंटे सपने चलते हैं और केवल 2 घंटे ही वास्तव में स्वप्नहीन (deep sleep) नींद होती है। 

• साक्षी भाव (Observation): जो लोग ध्यान करते हैं, वे नींद में भी साक्षी बने रहते हैं। ओशो के अनुसार, व्यक्ति का एक कोना हमेशा जागता रहता है, जो देखता है कि नींद कितनी गहरी है। 

• नींद में ध्यान (Meditation in Sleep): ओशो ने "सचेत नींद" (conscious sleep) पर जोर दिया है। उनका मानना था कि यदि आप बहुत ज्यादा सोते हैं, तो नींद में भी जागरण का अनुभव किया जा सकता है। 

• सपनों से मुक्ति: जब आप जीवन को बिना सपनों के, जैसा वह है, वैसा देखना शुरू करते हैं, तो सपने कम हो जाते हैं। 





गुरुवार, 19 मार्च 2026

सादगी के मुख्य पहलू: ओशो

 



ओशो के अनुसार सादगी के मुख्य पहलू: 


• तुलना का अंत: जब आप तुलना बंद कर देते हैं, तो प्रतिस्पर्धा, हिंसा और ईर्ष्या समाप्त हो जाती है। सादगी में आप स्वयं को और दूसरों को वैसे ही स्वीकार करते हैं जैसे वे हैं। 

• मन की शांति: ओशो के अनुसार, सादगी का मतलब है मन को समझना और उसे शांत करना, न कि उसे विचारों से भरना। यह एक 'अकर्ता' (non-doer) अवस्था है। 

• वर्तमान में जीना: अतीत की यादों और भविष्य की कल्पनाओं से मुक्त होकर, जो अभी है, उसमें जीना ही सच्ची सादगी है। 

• निर्दोषता (Innocence): सादगी का मतलब है बच्चे जैसी मासूमियत, जहाँ अहंकार (ego) का कोई स्थान न हो। 

• सहजता: जो कुछ भी स्वाभाविक है, उसे अपनाना। ओशो के अनुसार, सत्य सरल है, और जटिलता अहंकार का निर्माण है। 


ओशो अक्सर कहते थे कि सादगी ही वह तरीका है जिससे आप अस्तित्व (existence) के साथ एक हो सकते हैं, क्योंकि सत्य सादगी में ही प्रकट होता है। 



शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

मौन की शक्ति - ओशो


 


ओशो के अनुसार मौन के मुख्य पहलू: 

• आंतरिक संवाद बंद करें: मौन का अर्थ केवल मुँह बंद रखना नहींबल्कि मन की बड़बड़ाहट को भी रोकना है। 
• हृदय का मिलन (Communication of Hearts): जब दो लोग मौन में बैठते हैं (जैसे प्रेमी)तो एक-दूसरे की चेतना पर छा जाते हैंजिससे शब्दहीन संवाद होता है। 
• साधना का सार: मौन वास्तविक साधना हैजो शब्दों में नहींबल्कि आंतरिक सन्नाटे और जाग्रति में है। 
• आनंद और शांति: मौन में होना ही परमानंद (bliss) हैजहाँ चिंताएं और तनाव नहीं होते। 
• मन की शून्यता: मन एक बुलबुले की तरह हैइसे चुप कराकर ही भीतर के शून्य (Silence) तक पहुँचा जा सकता है।